Wednesday, 14 August 2013

छलावा

छलावा
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................आकांक्षा त्यागी
छलावा छल गया रे
हय ,इस मन को छलावा छल गया रे
यूँ रोया मैं उनके ज़ख्मों पर
दी खुद को सजा हर पल ,हर कदम
रहा खौफसदा इसी बैचेनी में हर दम

बह गये वो तो यूँ बन के
एक हिस्सा इस कहर का
लेकिन रह गया मैं 
फडफडाता इस  बिन पानी के समुन्दर में

हर ओर छाया है ये धुंधलापन
मन के मेरे इस शीशे पर
टूटे मेरे सारे ये भरम
ना रहा अब मेरा कोई दीन धरम
छलावा छल गया रे l

गुज़रता चला हूँ मैं आज
जिंदगी के हूँ ,अब इस मुकाम पर
देखता हूँ सच इस कदर
कि बयां भी ना कर पाऊं
छलावा छल गया रे l
            ............................................ आकांक्षा त्यागी

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