आज की हवा
न जाने क्या था आज की हवा में
पाया सन्नाटा मैंने आज की हवा में
थी शर्मसार ये दुनिया उसकी वफ़ा में
नज़रे नहीं मिला पाया कोई आज की हवा में
जाना मैंने ये की हैं शर्मिंदा आज ये
उसके गुनाह पर ,
अपनी रूह से भी न मिल पाए कभी ये
फिर भी हैं करते हैं अफ़सोस ये ,उसके गम में,
ये आज की हवा में
वाकिफ़ हुए लोग, उस एक के गुनाह से आज
पर झाँका, अब भी नही अपनी कारिस्तानियो पर
दूर खड़ा देख रहा वो भी
तेरे बेगैरत अंदाज़ को ,
आज की हवा में
उसकी सिसकियों में तू भी हैं शामिल
उसके दर्द में तू भी हैं शामिल
इंसानियत को रौंद कर हँस रहा तू
ऊँगली उठा रहा अपनी ही तरफ तू
अरे ! झाँक जरा तू अपने भी अन्दर ,देख जरा तू अपनी भी रूह
आज की हवा में।।।।।
........................................आकांक्षा त्यागी
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