Monday, 24 February 2014

भटका हुआ देवता

भटका हुआ देवता
मैं था अजन्मा ,अविनाशी
मैं था आनंदमय,अजर
लेकिन जान न पाया
नित्य नए नए आडम्बरो में होता रहा लुप्त मैं

अपनी आकांक्षाओ व् दर में गम होता मैं
दिन पे दिन मरता मैं
रोता,बिलखता ,लक्ष्य की चाह में
धोका देता मैं 

दलदल में डूबता रहा मैं
तब हुआ असहनीय जीना
तब देखा कुछ और ही हैं ये रोना
जाना की मेरा कुछ था ही नही

कितना सरल,सुलभ था जीवन ये मेरा
बेकार ही था में बोझ उठाता था मैं
पल पल धोखा करता था मैं
अज्ञानी मूर्ख था मैं

ढूंढा उसे मैंने यहाँ -वहां
शाम-सवेरे
अंत में पाया खुद अपने ही भीतर
मैं भटका हुआ देवता
मैं भटका हुआ देवता।।।।।।
आकांक्षा त्यागी
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