Thursday, 20 February 2014

जिंदा

जिंदा
पूछा मैंने एक दिन उस बेपरवाह नूर से
की क्या हैं तुझमे जो हैं' तू इतना परे इस दुनिया से
बोल वो हँसते हँसते
की बताएगा एक दिन कभी वो जाते जाते
हर एक दिन,हर पल
ताकता रहा मैं उस खुदी के शाह को
की मिल जाये जवाब मुझे उसके ब्यान में

दिन गुजरा ,रात गुजरी गुजर गयी सदियाँ भी 
लेकिन वो हंस कर के टाल देता
मेरे सवालों को
ऐसा लगा की वो हैं एक ध;ता दिया
जो देता हैं लौं दूसरों को जलने की

पाया मैंने जैसे वो फूंकता हैं जान वो
दुसरो में जिन्दगी जीने की
जाना मैंने की पत्थरों के इस मुल्क में
हैं केवल वहिक्स्वाही एक जो हैं जिंदा

यूँ तो दावा हर कोई करता हैं
जिन्दा होने का
जाना मैंने की वही हैं एक जो हैं परे
हर ख़ुशी और हर गम के

पाया मैंने की केवल वही हैं मुक्त
इस गुलामी की जंजी से जकड़े हुए संसार में
आया वो एक दिन भी
जा रहा था वो एक दिन
देका मैंने उसे सवालो भरी आँखों से

हँसते हँसते दे गया जवाब
वो अपने शाही रुबाब से
और रह गया मैं एक टक देखता
खोके उसके इस बेपरवाह नवाबी अंदाज़ में .........
-----आकांक्षा त्यागी

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