तेरा सच
उनके मुक्कमल जहाँ में
मैं हारा हुआ ही सही
लोग आहात होते हैं जिस से
वो मैं ही तो हूँ
कहते हैं वो कामयाब खुद को
पर उनसे ज्यादा खौफ में कोई और नही
क्या साबित करेगा तू
सताकर खुद के वजूद को
जी रहा हैं तू मरकर भी आज
और देखो जरा उस पर भी हैं नाज़
तेरी उम्मीद ,तेरी चाह ,वो राह
ले जा रही हैं तुझे कहाँ
अब बस भी कर बन्दे
कब तक रहेगा तू इस बदसूरत जहाँ में
तेरी सूरत ,वो मूरत
बिखरेगी जिस दिन
चीखेगा ,चिल्लाएगा
पर वो ज़ंजीर ना तोड़ पायेगा
कब तक रहेगी तेरी ज़िन्दगी गुलाम
और फिर तू कहता हैं की तू हैं आज़ाद
न दे नाम उसे मजबूरी का
अब बस भी कर तेरा ये नाटक
आखिर कब तक नाम देगा उसे
तू ज़िन्दगी का
और अब ,कब जागेगा तू
अब तेरी हस्ती ही धुंधली ना पड जाये .......
आकांक्षा त्यागी
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