Friday, 21 February 2014

इश्क

इश्क 
बेवक्त,बेनाम तबियत हैं इश्क
बेरंग,बेनकाब हैं इश्क
हर एक रोज़ तेरा वजूद हैं मिटता
हर एक पल तेरा किस्सा हैं बदलता
अब जाने भी दे तेरा इश्क ही हैं झूठा

न आजमा उस शक्सियत की मौजूदगी
की उदा देगा वो तेरी हस्ती कुछ ऐसे, रेत की तरह
यू तो वो हैं बेरंग रंगीला 
पर उसको जानने की औकात हैं नहीं अभी तेरी

चीख कर क्या कर पायेगा तू गिरो के बेपैर ख्वाबों को पूरा
फिर रोएगी तेरी हस्ती जो तू उसे भुला देगा
तेरी लो भी थर्थाराएगी
उसको राख तब भी न कर पाएगी

न तोल पायेगा तू उसकी हकीकत फिर भी
वो जला देगा तेरे उस बुत को
और फिर रह जाएगा सिर्फ इश्क .
-आकांक्षा त्यागी

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