Thursday, 20 February 2014

इल्म उस एक का ----आकांक्षा त्यागी

इल्म उस एक का

हम देखेंगे उसके आने को
उसके महफूज़ कदमों को
यूँ तो हम बेफिक्र हो उड़े जाते हैं
पर शोलो पर जलती हैं ये बेफिक्री
हर लम्हा 'हर पल ज़ोर रहता हैं
उन नवाबों के दकियानूसी ख्यालों का

बेचते हैं वो महफूज़ होने' को भी 
अरे !वो कहते हैं की दुकानों पर बिकती हैं ख़ुशी
ख़ुशी तो छोड़ो ,बेचते हैं वो दर्द को भी
उसकी मोजूदगी का एहसास होता हैं उन्हें किताबों और पत्थर की मूर्तियों में

भूल जाते हैं वो उसे, उस कुफ्र की घडी में
नफरत खुलेआम करते हैं वो
पर प्यार करते हैं चोरी से
हर बार ,बार-बार कोई तो आया खोलने उनकी आँखें
लेकिन वो सोये रहे गहरी नींद में हमेशा

कठपुतलियों की तरह नाचना हैं मंज़ूर
पर करके खुदी को खड़ा ,नगवारा हैं उन्हें
यूँ तो हँसतें हैं वो खिलखिलाके
पर खुद की ख़ामोशी में बिलखतें हैं हूजूर

रोज़ मांगते हैं वो मुराद उस एक से
बदले में कुछ लौटने के वादे के साथ
उन्हें शायद ही फर्क पड़ता , किसी के दर्द से
ना होता गर खौफ उन्हें उसका

कहते हैं वो की हम जानते हैं खुद को
और फिर चल पड़ते हैं किसी और के नक़्शे -कदम पर
बस इसी तरह बिताते हैं वो ये बेशकीमती ज़िन्दगी
घंटे,दिन,बरस और सदियाँ गिनते ,गिनते ............................
- आकांक्षा त्यागी

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