Thursday, 20 February 2014

मंजिल

मंजिल 

          ....  आकांक्षा  त्यागी 
मंजिल तो मेरी यहीं थी
आना मुझे यहीं था
पर यूँ ही भटकता रहा मैं हर पल
खुद से खुदी के दरमियाँ
फासले रहे हर वक़्त

हस्ते थे लोग मेरे पागलपन पे
तो ठिठुर जाता था मैं
न जाने क्यूँ उनके डर से 
मेरा डर ,वो इल्म यूँ सताता रहा मुझे

सोचा गुजर जाएगा ये वक़्त
तो शायद मिलेगी वो ख़ुशी जरूर मुझे
क्या खोया,क्या पाया
रहा मसरूफ उसी के हिसाब में

जीना भूल गया मैं तो
अरे!उनके हिसाब में
कितना नाखुश रहा मैं
हर परवाह का घोंसला था मैं

अब जाके जला हूँ मैं
इस चैन की आग में
आज़ाद हुआ मैं ,उस दर्दभरी जिन्दगी से
और आज़ाद हुआ एक खोखलेपन से मैं

क्या था मैं,मैंने न जाना कभी,
यूँ ही घुलता गया ,ख्वाहिशों के सागर में मैं
बस यहीं थी मेरी मंजिल
अब जाना हूँ मैं ,
यहीं थी मेरी मंजिल
और अब जान पाया हूँ मैं
.....आकांक्षा त्यागी
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